क्यों करते हैं दोस्ती का ढोंग
जब निभाने का मकसद होता ही नहीं,
क्यों देते है सुख में साथ
जब कष्ट में दिल सहलाना ही नहीं
गलती मेरी ही है,
की नासमझी में बनाता हु ये दोस्त,
या दोस्त बन के दोस्ती का फ़र्ज़ पूरा करता ही नहीं,
आज अकेले हु, समंदर के बीच में,
पर साहिल से कोई आवाज़ लगाता ही नहीं,
कोई पास बुलाता ही नहीं,
कोई सीने से लगाता ही नहीं,
कोई अपना बनाता ही नहीं,
कोई दोस्त बनता ही नहीं |
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