Sunday, August 4, 2013

Haathi aur Darzi

हाथी और दर्जी (स्त्रोत)
जमालपुर में एक तालाब था । वहाँ के ठाकुर हरनाम सिंह ने एक हाथी पाल रखा था । उसका नाम था भोंदु । अब यह गाँव थोडा अजीब था । यहाँ बड़े कद और कम वज़न वाले इंसानों और पशुओं का मज़ाक उड़ाया जाता था । भोंदु भी लम्बा और पतला था । और हरनाम सिंह के बाकी पालतू जानवर, घोड़े, भैंस, खरगोश आदि इस्पे भोंदु का मज़ाक उड़ाते थे और उसे काफी परेशान करते थे ।

भोंदु उनसे दूर ही रहने की कोशिश करता था । भोंदु को तालाब में नहाना बहुत पसंद था और इसी कारण वश वेह रोज़ सुबह तालाब चले जाता था और शाम तक ही आता था ।

जिस रास्ते से भोंदु तालाब जाता था उसी रास्ते पे गोलू दर्जी की दूकान भी पड़ती थी । भोंदु रोज़ गोलू की दूकान  के करीब से निकलता था । और वह रोज़ गोलू के ग्राहकों का गोलू के साथ बर्ताव भी देखता था । गोलू खुद भी लम्बा और पतला था । आप समझ ही सकते है की क्यों लोग उसे चिढाते थे । भोंदु यह देखता और सोचता की उसके साथ भी तो यही होता है । और गोलू को भी भोंदु की विवशता के बारे में पता था ।

भोंदु रोज़ सुबह गोलू की दूकान पे रुकता पर वे बात नहीं करते । उल्टा दोनों दस मिनट शान्ति से साथ बैठते । गोलू भोंदु को एक केला देता और भोंदु आराम से उसे चबाता ।

सालों से ये सिलसिला चलता आ रहा था । भोंदु इस चुप्पी में मदहोश हो जाता था और अपनी माँ की कही हुई एक बात अकसर याद करता था, कि रूमी ने कहा है , "There is a voice that does not use words. Listen." कुछ ऐसा ही रिश्ता था दोनों का ।

एक दिन तालाब जाते हुए भोंदु ने देखा कि गोलू की दूकान बंद थी । भोंदु राम को कुछ समझ नहीं आया । इतने सालों में यह पहली बार हुआ था । खैर, भोंदु ने थोडा इंतज़ार किया और कुछ देर में चिंतित हो आए निकल पड़ा।

आले दिन भी यही हुआ। भोंदु की चिंता और बढ़ी | जब ५ दिन तक यही सिलसिला चला, तो भोंदु से रहा नहीं गया, और गोलू के हाल-चाल पता करने के तरीके सोचने लगा । उसने हरनाम सिंह के बाकी जानवरों से भी पुछा, वहीँ जानवर जिनसे उसने आज तक कुछ भी साझा नहीं किया था (at the cost of exposing himself) । पर कुछ नहीं पता चला ।

महिना निकल पड़ा । गोलू कहाँ है किसी को कोई खबर नहीं । भोंदु रोज़ दुकान पे रुकता, इधर उधर देखता और आगे निकल जाता । देखो ज़रा भोंदु का दृढ़ संकल्प, इतने दिनों बाद भी वह अपने दोस्त को रोज़ धुन्धने की कोशिश करता था।

फिर आखिरकार एक दिन, तालाब जाते हुए उसे दूकान से आवाजें सुनायीं दीं । भोंदु जल्दी से दूकान पंहुचा और दांग रह गया । दूकान बंद थी, पर दूकान का सार सामान दूकान के बाहर रखा हुआ था । और वहाँ मौजूद लोगो में गोलू भी था । एक तरफ तो भोंदु गोलू को देख ख़ुशी से समा नहीं पा रहा था, तो दूसरी ओर, सामान को दूकान के बाहर जमा देख उसे काफी आश्चर्य भी हो रहा था ।

हालाँकि भोंदु ने आज तक गोलू से कुछ बात नहीं की थी, लेकिन आज उससे रहा नहीं गया। उसने गोलू से पूछा, "गोलू राम, क्या हुआ? इतने दिनों से कहाँ गायब थे?"

गोलू ने कुछ जवाब नहीं दिया। जवाब तो दूर, उसने भोंदु की तरफ मुद के देखा भी नहीं। भोंदु  को लगा की गोलू को सुनाई नहीं दिया होगा, तो उसने फिर पुछा। गोलू ने फिर जवाब नहीं दिया। अब भोंदु को बुरा लगने लगा । वह इतने दिनों से रोज़ एक अच्छे दोस्त की तरह गोलू को ढूंढ रहा था, उसकी चिंता कर रहा था। और गोलू है की मुड़ के उसका जवाब भी नहीं दे सकता ।

भोंदु को गुस्सा आया। उसने जोर से कहा, "ये क्या मांजरा है? इतने दिनों से तुम गायब हो। कोई खबर नहीं। मैं चिंता से व्याकुल हो रखा हूँ। इतने दिनों से खान नहीं खाया, रात को सो नहीं पाता। हरनाम सिंह का काम भी ठीक से नहीं कर पा रहा। रोज़ पिटाई हो रही है मेरी। किसकी वजह से? सिर्फ तुम्हारी । लेकिन तुम एक जवाब देना ज़रूरी नहीं समझते?"

ये सुन गोलू जी पलटे। और भोंदु से बोले, " भाई, कौन हो तुम? काहे मुझपे ऐसे गुर्रा रहे हो? मैंने तुमसे आज तक बात नहीं की। पंडित जी की हिदायत के अनुसार रोज़ एक पतले और भद्दे जानवर को केला खिल देता था। ऐसे जानवरों से बात करना मई ज़रूरी नहीं समझता। अब तुम इसे दोस्तों समझ बैठे तो इसमें मेरी क्या गलती?"

This is a version of the 'Darzi aur Haathi ki kahaani' that I wrote when I was told to wear a detective's hat and fill the original story with details, as part of an exercise. It turned out to be very different from the original somehow. One version of the original can be found here. Keep clicking next to read the story.